Raigarh News: छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला घने जंगलों से घिरा है, लेकिन इन्हीं जंगलों के बीच इंसानी बस्तियों के कारण मानव हाथी संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। रात ढलते ही गांवों में सन्नाटा नहीं, बल्कि डर पसर जाता है। जंगल से निकलकर हाथियों के झुंड खेतों, कच्चे रास्तों और कई बार गांवों तक पहुंच जाते हैं। कोरबा, जशपुर और ओडिशा के जंगलों के बीच हाथियों की आवाजाही रायगढ़ को सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल करती है।
आंकड़े जो डराते हैं
रायगढ़ के जंगलों में अलग-अलग क्षेत्रों में 70 से 180 हाथियों के दल विचरण कर रहे हैं। बीते 25 वर्षों में मानव हाथी संघर्ष के चलते 170 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 75 से ज्यादा हाथियों की भी जान गई है। धर्मजयगढ़ वनमंडल इस टकराव का केंद्र बना हुआ है, जहां हर महीने 80 से 120 हाथी देखे जाते हैं।
अवैध उपाय बन रहे मौत की वजह
ग्रामीण आजीविका के लिए लकड़ी, तेंदूपत्ता बीनने और मवेशी चराने जंगल जाते हैं। कई बार हाथियों से सामना जानलेवा हो जाता है। फसलों को बचाने के लिए कुछ किसान खेतों के चारों ओर अवैध विद्युत तार बिछा देते हैं। इन तारों की चपेट में आकर हाथी, अन्य वन्यजीव और कई बार ग्रामीण भी जान गंवा देते हैं। यह मानव हाथी संघर्ष को और भयावह बना देता है।
वन विभाग की पहल और जागरूकता
वन विभाग ने संघर्ष रोकने के लिए अलर्ट ऐप, ट्रैकर और हाथी मित्र दल जैसी पहल शुरू की है। हाथियों की लोकेशन की जानकारी गांवों तक पहुंचाई जाती है ताकि सुरक्षित दूरी बनी रहे। हमलों में मृतकों के परिजनों को ₹6 लाख का मुआवजा दिया जाता है। साथ ही पटाखे, ढोल और तेज आवाज से हाथी भगाने जैसे तरीकों से बचने के लिए जागरूकता फैलाई जा रही है।
देशभर में बढ़ती चिंता
देश में भी मानव हाथी संघर्ष के आंकड़े चिंताजनक हैं। 2020–21 में 464, 2021–22 में 545, 2022–23 में 605 और 2023–24 में 629 लोगों की मौत हाथियों के हमलों से हुई। यह बढ़ता ग्राफ चेतावनी है कि संतुलन और समझदारी जरूरी है।
निष्कर्षतः, हाथी और इंसान दोनों की जान कीमती है। जंगलों का संरक्षण, कॉरिडोर की सुरक्षा और जिम्मेदार व्यवहार ही मानव हाथी संघर्ष का स्थायी समाधान है।
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