MP News: देश में ग्रामीण रोजगार की तस्वीर अब बदलने जा रही है। केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह वीबीजी रामजी बिल संसद में पेश कर दिया है, जिसे लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। एक ओर विपक्ष इस बिल का विरोध कर रहा है, तो दूसरी ओर सरकार इसे ग्रामीण भारत के लिए एक आधुनिक और प्रभावी समाधान बता रही है। यह बिल केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया है।
क्या है वीबीजी रामजी बिल?
वीबीजी रामजी बिल का पूरा नाम “विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन–ग्रामीण” है। इस कानून के तहत हर ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के वेतनयुक्त रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाएगी। यह मनरेगा से 25 दिन अधिक है, जहां पहले केवल 100 दिन का प्रावधान था। बिल लागू होने के छह महीने के भीतर राज्यों को इसे जमीन पर उतारने की योजना बनानी होगी।
कैसे बदलेगा ग्रामीण रोजगार का ढांचा
सरकार के अनुसार वीबीजी रामजी बिल एक केंद्र प्रायोजित योजना होगी, जिसमें 60 प्रतिशत खर्च केंद्र और 40 प्रतिशत राज्य सरकारें वहन करेंगी। इसमें 60 दिनों के ब्रेक पीरियड का भी प्रावधान है, ताकि खेती के पीक सीजन या प्राकृतिक आपदाओं के समय मजदूरों को नुकसान न हो। यदि तय समय पर काम नहीं दिया गया, तो मजदूरों को भत्ता देने का प्रावधान भी शामिल है।
मनरेगा से क्यों अलग है नया बिल?
सरकार का तर्क है कि मनरेगा 2005 की परिस्थितियों के अनुसार बना था, जबकि आज ग्रामीण भारत में डिजिटल पहुंच, कनेक्टिविटी और सामाजिक सुरक्षा बेहतर हुई है। वीबीजी रामजी बिल जल सुरक्षा, ग्रामीण आधारभूत ढांचे, आजीविका संसाधनों और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित होगा। पंचायत स्तर पर योजनाएं बनेंगी और उन्हें राष्ट्रीय तंत्रों से जोड़ा जाएगा।
कुल मिलाकर, सरकार मानती है कि वीबीजी रामजी बिल से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और ग्रामीण विकास को नई गति मिलेगी, हालांकि विपक्ष इसे राजनीतिक बदलाव के रूप में देख रहा है।
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